एक फरिश्ते से मुलाकात – राजीव आनंद

दोनों किडनी तुम्हारी फेल हो चुकी है, अब किडनी बदलवाना ही एकमात्र उपाय है, डॉक्टर साहब ने बिरजू माली को कहा.

बिरजू घबरा गया, किडनी बदलवाने में कितना खर्च आता है डॉक्टर साहब, उसने पूछा ?

डॉक्टर साहब कुछ देर सोचने के बाद कहे कि यही कोई ढाई-तीन लाख रूपए.

बिरजू बेहोश होते-होते बचा और नीम-बेहोशी में ही डॉक्टर के चेंबर से निकल कर, बस स्टैंड की तरफ जाने लगा. जीने की अब कोई आशा नहीं बची थी. घर पर भरा-पूरा परिवार, दो लड़के, तीन लड़कियां, एक पत्नी, बूढ़े मां-बाप सभी तो थे, सोचते हुए बिरजू स्टैंड पहुंच चुका था. गांव के लिए अभी बस आने में देर थी, बिरजू वहीं एक फूटपाथी चाय की दूकान के बेंच के छोटे से हिस्से में बैठ गया. उसे मितली आ रही थी. वह समझ नही पा रहा था कि वह अब क्या करें.

इतने में उसके गांव जाने वाली आखरी बस आ चुकी थी पर बिरजू को हिम्मत नहीं हुआ कि वह उठ कर बस पर जा बैठे.

देखते-देखते रात घिर आयी, बिरजू चुपचाप उठकर यात्री सेड में एक कोने में बैठ गया, बैठ क्या गया, दीवार के ओट में पीठ सटा कर लेट सा गया. उसे पेट में दर्द भी हो रहा था और मितली भी आ रही थी.

उसी यात्री सेड में पत्थर के बेंच पर एक सज्जन बहुत देर से बैठे बिरजू को देख रहे थे, ऐसा मालूम होता था जैसे कुछ समझने की कोशिश कर रहें हो. कभी अपनी कलाई घड़ी देखते, कभी बिरजू को, अंतत उस सज्जन से नहीं रहा गया और वे बिरजू के पास चले गए और पूछा कि तुम्हें क्या तकलीफ है भाई ?

बिरजू जैसे नींद से जागा, उसे अंजान शहर में बस स्टैंड़ के यात्री सेड में किसी से कोई उम्मीद न थी. बिरजू नीम-बेहोशी में कहा कि बाबूजी मेरा नाम बिरजू है, डॉक्टर ने कहा है कि मेरे अंदर का कुछ खराब हो गया है, जिसे बदलवाने मंें काफी रूपया लगेगा. किडनी बिरजू को याद नहीं था इसलिए किडनी के संबंध में बता नहीं पाया. बिरजू ने उस सज्जन को सहानुभूति जताते देख, सिर्फ इतना ही गुजारिश किया कि बाबूजी मैं शायद सूबह तक न बंचू तो मेरे गांव में मेरे माता-पिता, बाल-बच्चों तक खबर पहुंचा देंगे तो मरते हुए इस आदमी की दुआ आपको लगेगी, आप फूले-फलेंगे.

वो सज्जन दरअसल एक प्रसिद्ध हामियोपैथ सजल आनंद थे और किसी मरीज को देखकर लौटने के क्रम में बस के इंतजार में वहां बैठे थे. वे बिरजू के मरज को लक्षणों के अनुसार समझ गए और मितली एवं पैट दर्द के आधार पर इलाज शुरू करते हुए चंद खुराख कागज के पूडिया में बना कर बिरजू को दिया और एक खूराख खिला भी दिया. घंटा भर बीत चूका था, बिरजू अब धीरे-धीरे उठ बैठा, उसे कुछ-कुछ अच्छा लग रहा था. होमियोपैथ डॉक्टर श्री आनंद ने बिरजू को अपना पता लिख कर दिया और कहा कि गांव जाकर दवाईयां लेते रहना और खत्म हो जाए तो मेरे पास आना, मैं तुम्हें फिर दवाईयां दूंगा.

बिरजू श्रद्धा से झूक गया और जैसा डॉक्टर साहब ने कहा था वैसा ही किया. रात बीतने लगी, डॉक्टर साहब की बस आ गयी थी, वे चले गए. सूबह तक बिरजू की हालत में कुछ सूधार हो चुका था, वह भी सूबह बस पकड़ अपने गांव चला गया. रास्ते में उसने डा. सजल आनंद के बारे में सोच रहा था कि सचमुच एक फरिश्ते की तरह उन्होंने उसे गांव तक पहुंचने लायक बनाया अन्यथा उसकी तो मृत्यु यात्री सेड में ही निश्चित थी. गांव पहुंच कर सारा वृतांत अपने माता-पिता, पत्नी, बच्चों को खूशी-खूशी सूनाया परंतु उसे और न ही उसके परिवार के किसी सदस्य को यह भरोसा हुआ कि चंद पूड़ियों मंे दिये गए औषधि से बिरजू का रोग ठीक होने वाला है. बिरजू खूद भी ऐसा मान कर नहीं चल रहा था कि सफेद चुटकी भर पाउडर से उसे रोग मुक्ति मिलेगी, पर मरता क्या नहीं करता. इसी चुटकी भर पाउडरनूमा औषधियों के बदौलत वह शहर से गांव आ सका था. पंद्रह दिन बित गए और बिरजू की दवाईयां भी खत्म हो गयी थी. अपने रोग में सूधार देखते हुए उसने शहर जाकर होमियोपैथ डॉक्टर से मिलने का मन बनाया और सूबह की बस पकड़ कर डॉक्टर साहब के यहां पहुंच गया.

डॉक्टर साहब का पता पूछते हुए वह जब डॉक्टर सजल आनंद के घर पहुंचा तो देखता है कि डॉक्टर साहब अपने घर के बगल में एक खूले मैदान में एक पेड़ के नीचे बेंत का टेबूल और कुर्सी में बैठे है और रोगियों को देखते जाते है और दवाईयां भी देते जाते है. दूर से ही बिरजू को आते देख डॉक्टर साहब ने उसे पहचान लिया और जोर से पूकारते हुए कहा , आओ बिरजू, अब कैसी तबियत है ?

बिरजू झेंप सा गया,, उसे इतने अमीर और सभ्रांत डॉक्टर से ऐसी उम्मीद ही नही थी कि डॉक्टर साहब को उसका नाम भी याद रहेगा और रोग भी.

बिरजू जबरन मुस्कूराने की कोशिश करता हुआ कहा कि ठीक हूं डॉक्टर साहब, पहले से सेहत में सुधार आया है. डॉक्टर साहब ने बिरजू से कुछ सवालत किए और फिर चूपचाप कुछ सोचते हुए दवाईयों का पुडिया बनाने लगे.

चूप देखकर बिरजू ने डॉक्टर साहब से बड़ी हिम्मत कर पूछा कि डॉक्टर साहब मेरे अंदर क्या खराब है, कुछ दिन पहले एक दूसरे डॉक्टर ने बताया था पर मैं भूल गया, क्या आप बता सकते है कि मेरे अंदर क्या खराब हुआ है ?

डॉक्टर साहब तब तक बिरजू के लिए दवाईयां तैयार कर चुके थे. एक खूराक उसी समय खाने की ताकिद करते हुए बाकी पुड़ियों को एक बड़े लिफाफे में देते हुए बिरजू को समझा दिया कि दवाईयां कैसे और कब खानी है.

डॉक्टर साहब ने कहा कि बिरजू तुम्हारे अंदर कुछ भी खराब नहीं है. घबराने की कोई बात नहीं है. तीन महीने की दवाईयां दे दिया है, अब तीन महीने बाद आना, परहेज जो मैंने बताया उस पर अमल करना, दवाईया खत्म होते-होते तुम्हारा रोग भी जाता रहेगा.

बिरजू न चाहते हुए भी खूश होने का स्वांग भरते हुए डॉक्टर साहब को उनकी फीस देचा चाहा पर डॉक्टर साहब ने कहा अभी रखो, तुम जब पूर्ण रूप से ठीक हो जाओगे तब जो दोगे, मैं रख लूंगा.

बिरजू क्या करता, कुछ पैसे लाया था, उसे अपने पास ही रख लिया और दवाईयां लेकर गांव चला गया. जिस तरीके से डॉक्टर साहब ने बिरजू को दवाईयां खाने और परहेज करने को कहा था, बिरजू उसी तरह तीन महीने तक दवाईयां खाता रहा और परहेज करता रहा परिणामत तीन महीने बाद बिरजू का रंग रूप बदल गया था. अब वह खेतों में भी आसानी से काम करता था. खाना-पिना भी अब उसका सामान्य हो चुका था, अब उसे किसी भी तरह की शिकायत नहीं थी.

एक दिन बिरजू ने सोचा कि ठीक तो वह हो ही चुका है, कुछ घर का चावल, चूड़ा और मडुआ ही ले जाकर डॉक्टर साहब से मिल आता हूं. दूसरे दिन सभी समानों को लेकर शहर चला गया डॉक्टर साहब से मिलने, उन्हें चावल, चूड़ा और मडुआ देकर बिरजू बहुत खूश हुआ. डॉक्टर साहब भी खूशी-खूशी बिरजू के उपहार को स्वीकार किए. बिरजू डॉक्टर साहब से बिदा लेकर वापस जा ही रहा था कि उसे न जाने क्यों उस डॉक्टर से मिलने का ख्याल आया, जिन्होंने उसके किडनी फेल होने की बात कही थी और ऑपरेशन करवाने को कहा था.

बिरजू उस डॉक्टर के क्लिीनिक पहुंचा, घंटे भर बाद बिरजू को डॉक्टर साहब से मूलाकात हुई. बिरजू ने डॉक्टर साहब को याद दिलाया कि कुछ महीने पहले वह यहां आया था, डॉक्टर साहब को याद आ गया, हां-हां, मुझे याद आ गया, डॉक्टर साहब ने कहा, तुम्हारा दोनों किडनी फेल हो चुका था और तुम्हें ऑपरेशन कराना था जिसमें दो-ढाई लाख खर्च था. क्या रूपए का इंतजाम हो गया, डॉक्टर साहब ने पूछा ?

बिरजू ने कहा एक बार फिर देखीए कि अभी क्या हालत है? कब तक ऑपरेशन करवा लेना चाहिए. डॉक्टर साहब खूश हो गए और सोचा आसामी तो लौट आया. उन्होंने जांच करना शुरू किया, घंटे भर जांच करने के बाद डॉक्टर साहब के माथे का पसीना सूख ही नहीं रहा था. उन्हें बार-बार लग रहा था कि जांच में कहां भूल हो रही है. दोनों किडनी तो बिल्कुल ठीक-ठाक नजर आ रहा है. ऐसा कैसे संभव है, सोच रहे थे डॉक्टर साहब.

घंटे भर बाद बिरजू पूछा, क्या डॉक्टर साहब कब ऑपरेशन किजीएगा ?

डॉक्टर साहब कुछ भी बोल नहीं पा रहे थे. बिरजू भी फिर कुछ नहीं बोला, चेंबर से बाहर निकला और सीधा बस स्टैंड की ओर एक फरिश्ते से सूखद मुलाकात की बात सोचता हुआ चल दिया. जिसने

बिरजू को नया जीवन दिया था, सचमुच बिरजू जैसे गरीब रोगी के लिए सजल बाबू जैसे डॉक्टर एक फरिश्ता ही थे जो रूपए के लिए नहीं मानवता की सेवा के लिए डॉक्टरी कर रहे थे.

राजीव आनंद

 

 

Taken from : http://www.pravasiduniya.com/an-angel-met-rajiv

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