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दु:ख ही सुख का ज्ञान

 

“दुख के अन्दर सुख की ज्योती
दुख ही सुख का ज्ञान
दर्द सह के जन्म लेता
हर कोई इनसान |”

संसार में जितना भी सुख है, वह सारा का सारा ज्ञान के कारण है और जितना दुख है, वह अज्ञान के कारण है।दुःख भोगने से ही सुख के मूल्य का ज्ञान होता है|यदि आप जीवन में सुख-शांति चाहते हैं तो दूसरों को सुख देने की कोशिश करें। याद रखें संसार में सुख ज्यादा है दुख कम। 85 प्रतिशत दुख हम अपनी बेवकूफी से पैदा करते हैं। 15 प्रतिशत दुख दुष्कर्म से प्राप्त होता है।

अपने कार्य ही सुख-दुख देने वाले होते हैं। जो जैसे कार्य करेगा उसे वैसा ही फल मिलेगा।विश्व में सुख-दुख की कोई व्याख्या नहीं हैं हमारी चार पैसों की आवश्यकता की पूर्ति ही सुख है और आपूर्ति दुख।

दुख सहनशीलता तथा सन्तोष का मधुर पाठ है।दुख का आरम्भ तीव्र कटु है, किन्तु अन्त में अत्यंत मीठा है|कड़वी औषधि ही अन्त में लाभदायक होती है और पुष्प तोड़ने वाले को ही अपना हाथ कांटों से छेदना पड़ता है।

दुख सुख से उत्तम है तथा दुख ही सुख का जनक है।

 

 
Ref :
[1] http://www.smitcreation.com/badi-badi-baatein/dukh-bhogne-sey-hi-sukh-ke-mulya-ka-gyan-hota-hai/ (Image)
[2] http://hindi.webdunia.com/indian-religion-sant-pravachan/संसार-में-सुख-ज्यादा-दुख-कम-112020600117_1.htm
[3] http://literature.awgp.org/akhandjyoti/edition/1941/Feb/15

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