Sanskar (संस्कार) – better living and high(positive) thinking

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I  define Sanskar (संस्कार) as ,

“Education of a person for better living and high(positive) thinking is Sanskar(संस्कार)”.

Enriching our self with sanskar is a life time (continuous) process.

10 Properties of Sanskar are :

  1. Provide sound mental and physical health and the confidence to face life’s challenges
  2. Build positive attitude of mind and action which leads to purify blood and increase blood circulation, sending more oxygen to every organ
  3. Energizes the body and revitalizes it
  4. Increase physical strength and stamina to work for longer period of time
  5. Rejuvenate(फिर से युवा करना) the mind and enhance concentration and intellectual capacity
  6. A sense of belonging, culture, and refined sensibilities
  7. Direct energy to humanitarian causes thereby building a strong character
  8. Kill vices, such as pride, ego, selfishness, wrath, envy, covetousness(लोभ), gluttony(लालच), sloth(आलस), lechery(कामुकता ), greed and fear
  9. Bestow(प्रदान करना) moral and physical balance throughout life
  10. Give the confidence to face death bravely owing to a contented and righteous life.

Before any action ask your conscience,”Would this action belongs to my sanskar?”

In the Ramayana, Surpanakha’s (lack of) sanskaar allows her to approach a married man for pleasure; Sita’s sanskaar compels her to risk personal security and feed a hungry sage who turns out to be demon; Ram’s sanskaar forces him to abandon his beloved innocent wife as she is deemed queen of stained reputation. In the Mahabharata, Draupadi abandons all sanskaar and becomes violent and bloodthirsty when she is publicly abused and all family decorum is abandoned by her vile brothers-in-law, the Kauravas. Yet, this very same Draupadi recalls sanskaar when she forgives her sister-in-law Dushala’s lecherous husband, Jayadhrata, even though he tries to abduct her.

संस्कृत भाषा का शब्द है संस्कार। मन, वचन, कर्म और शरीर को पवित्र करना ही संस्कार है। हमारी सारी प्रवृतियों और चित्तवृत्तियों का संप्रेरक हमारे मन में पलने वाला संस्कार होता है। संस्कार से ही हमारा सामाजिक और आध्यात्मिक जीवन पुष्ट होता है और हम सभ्य कहलाते हैं। व्यक्तित्व निर्माण में संस्कारों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। संस्कार विरुद्ध आचरण असभ्यता की निशानी है। ‘संस्कार’ मनुष्य को पाप और अज्ञान से दूर रखकर आचार-विचार और ज्ञान-विज्ञान से संयुक्त करते हैं।

कर्म के संस्कार : हिंदू दर्शन के अनुसार, मृत्यु के बाद मात्र यह भौतिक शरीर या देह ही नष्ट होती है, जबकि सूक्ष्म शरीर जन्म-जन्मांतरों तक आत्मा के साथ संयुक्त रहता है। यह सूक्ष्म शरीर ही जन्म-जन्मांतरों के शुभ-अशुभ संस्कारों का वाहक होता है। ये संस्कार मनुष्य के पूर्वजन्मों से ही नहीं आते, अपितु माता-पिता के संस्कार भी रज और वीर्य के माध्यम से उसमें (सूक्ष्म शरीर में) प्रविष्ट होते हैं, जिससे मनुष्य का व्यक्तित्व इन दोनों से ही प्रभावित होता है। बालक के गर्भधारण की परिस्थितियाँ भी इन पर प्रभाव डालती हैं।

ये ‘संस्कार’ ही प्रत्येक जन्म में संगृहीत (एकत्र) होते चले जाते हैं, जिससे कर्मों (अच्छे-बुरे दोनों) का एक विशाल भंडार बनता जाता है। इसे ‘संचित कर्म’ कहते हैं। इन संचित कर्मों का कुछ भाग एक जीवन में भोगने के लिए उपस्थित रहता है और यही जीवन प्रेरणा का कार्य करता है। अच्छे-बुरे संस्कार होने के कारण मनुष्य अपने जीवन में प्रेरणा का कार्य करता है।

अच्छे-बुरे संस्कार होने के कारण मनुष्य अपने जीवन में अच्छे-बुरे कर्म करता है। फिर इन कर्मों से अच्छे-बुरे नए संस्कार बनते रहते हैं तथा इन संस्कारों की एक अंतहीन श्रृंखला बनती चली जाती है, जिससे मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण होता है।

उक्त संस्कारों के अलावा भी अनेकों संस्कार है जो हमारी दिनचर्या और जीवन के महत्वपूर्ण घटनाक्रमों से जुड़े हुए हैं, जिन्हें जानना प्रत्येक हिंदू का कर्तव्य माना गया है और जिससे जीवन के रोग और शोक मिट जाते हैं तथा शांति और समृद्धि का रास्ता खुलता है। यह संस्कार ऐसे हैं जिसको निभाने से हम परम्परागत व्यक्ति नहीं कहलाते बल्कि यह हमारे जीवन को सुंदर बनाते हैं।
हिंदू धर्म में सोलह संस्कारों का बहुत महत्व है।इन संस्कारों के नाम है-

(1)गर्भाधान संस्कार, (2)पुंसवन संस्कार, (3)सीमन्तोन्नयन संस्कार, (4)जातकर्म संस्कार, (5)नामकरण संस्कार, (6)निष्क्रमण संस्कार, (7)अन्नप्राशन संस्कार, (8)मुंडन संस्कार, (9)कर्णवेधन संस्कार, (10)विद्यारंभ संस्कार, (11)उपनयन संस्कार, (12)वेदारंभ संस्कार, (13)केशांत संस्कार, (14)सम्वर्तन संस्कार, (15)विवाह संस्कार और (16)अन्त्येष्टि संस्कार।

Ref :

  1. http://devdutt.com/articles/indian-mythology/whats-your-sanskaar.html
  2. http://hindi.webdunia.com/sanatan-dharma-niti-niyam/जानें-हिंदू-संस्कार-111022300061_1.htm
  3. https://nz.answers.yahoo.com/question/index?qid=20140627025732AAVySVb

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