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कोहबर की शर्त(लेखक – केशव प्रसाद मिश्र) से बनी दो फिल्म “हम आपके हैं कौन” और “नदिया के पार”

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“हम आपके हैं कौन” की कहानी राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म “नदिया के पार” का रीमेक है।जहाँ “नदिया के पार” की पृष्ठभूमि में भारत के गाँव थे वहीँ “हम आपके हैं कौन” की पृष्ठभूमि में भारत के शहर।“नदिया के पार” फिल्म हिंदी उपन्यास “कोहबर की शर्त” की कहानी पर आधारित है।कोहबर नेपाल के तराई क्षेत्र में प्रचलित चित्रकारी की एक विधा है।विवाह के समय, घर के किसी एक कमरे में पूर्वी दीवाल पर गोबर से लीप कर, पिसी हल्दी (ऐपन) और पिसे चावल (चौरठ) से चित्रकारी की जाती है; इसके ठीक नीचे जमीन पर गोबर से लीप कर विविध पूजन सामग्रियाँ रखी जाती हैं।वर एवं वधू पक्ष दोनों के घर में, विवाह की विविध रस्मों में से एक कार्यक्रम कोहबर पूजन का भी होता है जिसमें भीत पर बने इस कोहबर का पूजन किया जाता है।

उपन्यास की कहानी फिल्म से ज्यादा जुदा नहीं है बल्कि बहुत ही जुदा है।फिल्म उपन्यास के पहले भाग पर आधारित है। फिल्म दूसरी शादी में भागीदारों को बदल देता है, क्योंकि उपन्यास में गुंजा और ओमकार के बीच प्रस्तावित विवाह किया जाता है।उत्तरप्रदेश और बिहार से बीच स्थित जिले बलिया के एक गाँव बलिहार और चौबेछपरा में तब एक सम्बन्ध कायम हो जाता है जब बलिहार के अंजोर तिवारी जो पुरे गाँव के काका थे और चन्दन के माँ-बाप भी के बड़े भतीजे ओंकार के लिए चौबेछपरा के वैद्द की लड़की रूपा का रिश्ता जुड़ा। चन्दन ओंकार का छोटा भाई था तो गुंजा रूपा की छोटी बहन। विवाह की रात कोहबर की रस्म में गुंजा और चन्दन की बीच चलने भी नोक-झोंक दोनों को एक ऐसे रास्ते पर लाकर खड़ा कर देती है जो जाकर उस सागर में गिरता जिसे लोग प्रेम, मोहब्बत, इश्क और चाहत कहते हैं। रूपा जब पहली बार गर्भवती हुई तो गुंजा चौबेछपरा से बलिहार आई जहाँ गुंजा और चन्दन के बीच के प्रेम ने आग पकडनी शुरू कर दी।लेकिन जहाँ तक सुना गया है और सच भी है, सच्ची मोहब्बत को सबसे पहले नज़र लगती है। रूपा दुसरे बच्चे को जन्म देने से पहले ही चल बसी। वैद्द जी सलाह पर ओंकार ने गुंजा से विवाह कर लिया। इतना कुछ हो गया लेकिन चन्दन अपनी पसंद, अपने प्यार और अपनी मोहब्बत के बारे में ओंकार को नहीं बताया। क्यूंकि ओंकार ख़ुशी में ही उसने अपनी ख़ुशी को पाने की कोशिश की। क्यूंकि ओंकार उसका बड़ा भाई ही नहीं बल्कि माँ-बाप से भी बढ़कर था। गुंजा ने भी चन्दन के कुछ बोल न पाने के कारण अपनी चुप्पी साध ली और ओंकार के साथ सात फेरे लेकर बलिहार आ गयी। लेकिन इससे गुंजा के मन में चन्दन के लिए प्रेम कम न हुआ वहीँ चन्दन के मन में एक असुरक्षा की भावना भी आ गयी।

उपन्यास मे संबंधों के विकास के साथ आगे बढ़ते है, जहां ओमकार की बीमारी से मृत्यु हो जाती है और अंततः गुंजा भी चंदन को छोड़कर मर जाती है।कहानी को चार भागों में हम विभाजित कर सकते हैं – कुंवारी गुंजा, सुहागिन गुंजा, विधवा गुंजा और कफ़न ओढ़े गुंजा। कुंवारी गुंजा जो चन्दन से अपार मोहब्बत करती थी। सुहागिन गुंजा जो चन्दन से अपार मोहब्बत करती रही। विधवा गुंजा जो चन्दन से अपार मोहब्बत करती रही। कफ़न ओढ़े गुंजा, जिसके प्रेम में चन्दन को खुद को बहा दिया।कहानी में चन्दन और गुंजा के जीवन की खींचातानी के बीच कुछ ऐसे प्रसंग हैं जो गाँव में जिए जा रहे जीवन को शब्द-ब-शब्द हमारे सामने चित्रित करना चाहते हैं।

“बलिहार” और “चौबेछपरा” के जनजीवन को आप उपन्यास में ही साक्षात जी सकते हैं। जहाँ फिल्म सिर्फ “चन्दन” और “गुंजा” के प्रेम और बलिदान पर आधारित थी वहीँ उपन्यास “चन्दन”, गुंजा और बलिहार के लोगों की कहानी है। लेकिन कोई अगर उपन्यास पढ़े तो उसे पता चल जाएगा की उपन्यास का केंद्र बिंदु सिर्फ – “गुंजा” और “बलिहार” है।

Ref:

http://iamsmpian.blogspot.com/2016/05/KohbarKiShart.html

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